मैं कुछ भी नहीं,
कुछ नहीं.....
पर,
मुझे बना दिया,
यह कैसा भ्रम जगा दिया,
मैं कुछ भी नहीं... कुछ नहीं .....
न कभी में हँसा, न रोया
पर तुने कभी हँसा, कभी रुला दिया
यह कैसा भ्रम जगा दिया,
मैं कुछ भी नहीं.... कुछ नहीं...
जो भी किया, तुने किया
और मुझमें मैं होना दिखा दिया,
यह कैसा भ्रम जगा दिया,
मैं कुछ भी नहीं.. कुछ नहीं....
न कभी जीता, पर तुने जीता दिया
न कभी हारा पर तुने हरा दिया,
यह कैसा भ्रम जगा दिया,
मैं कुछ भी नहीं... कुछ नहीं...
जो तूने किया, बस किया
और हमें अच्छा बूरा बता दिया
उलझा दिया,
यह कैसा भ्रम जगा दिया
मैं कुछ भी नहीं.... कुछ नहीं.....
हर पल है तू ही,
हर जगह है तू ही , बस तू ही
और कुछ भी नहीं,
फिर यह कैसा भ्रम जगा दिया
मैं कुछ भी नहीं.... कुछ नहीं.....
मैं कुछ भी नहीं... कुछ नहीं....