Saturday, February 26, 2011

mein.... kuch bhi nahi....

मैं कुछ भी नहीं,
कुछ नहीं.....

पर, 
मुझे बना दिया,
यह कैसा भ्रम जगा दिया,
मैं कुछ भी नहीं... कुछ नहीं .....

न कभी में हँसा, न रोया 
पर तुने कभी हँसा, कभी रुला दिया 
यह कैसा भ्रम जगा दिया,
मैं कुछ भी नहीं.... कुछ नहीं...

जो भी किया, तुने किया
और मुझमें मैं होना दिखा दिया,
यह कैसा भ्रम जगा दिया,
मैं कुछ भी नहीं.. कुछ नहीं....

न कभी जीता, पर तुने जीता दिया
न कभी हारा पर तुने हरा दिया,
यह कैसा भ्रम जगा दिया,
मैं कुछ भी नहीं... कुछ नहीं...

जो तूने किया, बस किया
और हमें अच्छा बूरा बता दिया
उलझा दिया, 
यह कैसा भ्रम जगा दिया
मैं कुछ भी नहीं.... कुछ नहीं.....

हर पल है तू ही,
हर जगह है तू ही , बस तू ही
और कुछ भी नहीं,
फिर यह कैसा भ्रम जगा दिया
मैं कुछ भी नहीं.... कुछ नहीं.....
मैं कुछ भी नहीं... कुछ नहीं....

hawa ...............

हवा ओ हवा
मुझे अपना दोस्त बना,
जैसे तू चले, मुझे भी चला
उमंगों में तरंगों में ,
कभी ज़मीन पर, कभी आसमाँ में,
हवा ओ हवा......

मुझे अपना दोस्त बना...
संग पाकर, शायद में भी हवा ही हो जाऊं 
भूल जाऊं खुद को,
में भी तुम हो जाऊं, हवा ओ हवा.....

मौज में, मस्ती में 
लह लहाना तुम्हारा,
या कभी पूर्ण मौन हो जाना तुम्हारा,
मुझे बहुत भाता है
ललचाता है, बस तुम हो जाने को, हवा ओ हवा......

तुम ही हर पल हर जगह, पर
तुम कभी होती नहीं आँखों के सामने 
 बस एक खालीपन होता है ,
या फिर एक हलचल सी फिजा में 
बस,
 मुझ में भी कुछ ऐसा भरदो ना
कि,
मैं ना रहूँ खुद को ना खो कर भी,
हवा हो हवा......

हवा होना, बस खुदा होना
खुद से ना खुद का जुदा होना,
अपनी ही एक-एक रग में हो आना जाना
यही है हवा में हवा होना,
हवा ओ हवा,
मुझे अपना दोस्त बना.....