Sunday, July 25, 2010

MYSELF

मैं बन कर एक पक्षी
देखता  हूँ अपनी उड़ान को
बहूत निचे रह जाता हूँ
पंख है छोटे
मगर  ढाप
लेना  चाहाता
हूँ  saarae  आसमान को
दूर देख रह हूँ बादल
बादल ही बन जाता हूँ
बरस पडू सारी धरती पर
पूरी धरती को ही अपने में समां लेना चाहता हूँ
कैसी मोहिनी खुसबू है लाल गुलाब की
क्यों न मैं भी गुलाब बंनु
हर एक हो मेरी तरफ आकर्षित
ऐसी छबी बना लेना चहाता हूँ
कैसी हरी हरी हरियाली है
इन हरे हरे पतों की
मैं भी एक पत्ता बन जाता हूँ
सबब बनू बसंत बहार का
कुदरत रंग बदले मुझ से
मेरा रंग हो बहार का

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