मैं बन कर एक पक्षी
देखता हूँ अपनी उड़ान को
बहूत निचे रह जाता हूँ
पंख है छोटे
मगर ढाप
लेना चाहाता
हूँ saarae आसमान को
दूर देख रह हूँ बादल
बादल ही बन जाता हूँ
बरस पडू सारी धरती पर
पूरी धरती को ही अपने में समां लेना चाहता हूँ
कैसी मोहिनी खुसबू है लाल गुलाब की
क्यों न मैं भी गुलाब बंनु
हर एक हो मेरी तरफ आकर्षित
ऐसी छबी बना लेना चहाता हूँ
कैसी हरी हरी हरियाली है
इन हरे हरे पतों की
मैं भी एक पत्ता बन जाता हूँ
सबब बनू बसंत बहार का
कुदरत रंग बदले मुझ से
मेरा रंग हो बहार का
No comments:
Post a Comment