यादों का अपना है चलन
अपनी है दुनिया और अपना है चमन
जब बैठा मैं बक्त को छोड़
यादों के जमखट में आ कर
खुद को पहचाना खुद को पाकर
खोला कभी जो मैंने यादों का झरोखा
चली ठंडी हवाए
और मेरे जख्मो को कुरेदा
उलझे क्यों इन से
इक बहाना से करते है
पीठ करके बैठे है मगर
मुड कर उसी का नज़ारा करते है
बात नहीं कि यहाँ काटों कि ही चुभन है
मचल पड़ते है यहाँ आने को
कि फूलो कि भी खुसबू है
यादे देती है जिंदगी
तो बना देती है मजार
फूल खिले बिन बहार के
या फिर खुसबू न दे
चाहे खिले हज़ार
यादें दूर एक धुआ सा नज़र आता है
छंटता है जब तो एक इन्सान नज़र आता है
छोड़ आये दूर मोड़ पर
जो अब छाया बना साथ चला आता है
दूर हो जाए उस दुनिया से मुमकीन नहीं
मिटा दे अपनी हस्ती
मगर यादों को मिटाना मुमकीन नहीं
छोड़ दू साथ खुद का खुद से
मगर यादों का साथ बरक़रार है
थक जाते है सब इक रह चल कर
इन का मगर हर रह पर साथ है
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