Monday, August 9, 2010

CHILDHOOD

कितनी साफ सवच्छ और मनोरम
थी गंगा
जब मैंने उसे
पहेले पडाब पर देखा था
चाहे  था रास्ता उबड़ खाबड़ और कट्टिला
जब मैंने उसे अपने बचपन कि दहलीज़
पर आते देखा था
मगर आज बहती मेरी आखो से
मैली मैली बन कर
घुल गयी नफ़रत सबार्थ और
ईर्ष्या इस में खुल कर
कैसे जानु कि यह गंगा ही है
या आखों से टपकता गन्दा पानी
अब जब देखता हूँ दूर उस का पहला पडाब
तो नज़र आती है मुजहे गंगा
और यह सिर्फ पानी

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