कितनी साफ सवच्छ और मनोरम
थी गंगा
जब मैंने उसे
पहेले पडाब पर देखा था
चाहे था रास्ता उबड़ खाबड़ और कट्टिला
जब मैंने उसे अपने बचपन कि दहलीज़
पर आते देखा था
मगर आज बहती मेरी आखो से
मैली मैली बन कर
घुल गयी नफ़रत सबार्थ और
ईर्ष्या इस में खुल कर
कैसे जानु कि यह गंगा ही है
या आखों से टपकता गन्दा पानी
अब जब देखता हूँ दूर उस का पहला पडाब
तो नज़र आती है मुजहे गंगा
और यह सिर्फ पानी
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